Near-Death Experience: A Blissful Journey

Near-Death Experience: A Blissful Journey



Near-Death Experience: A Blissful Journey

In this captivating reel, explore the profound and transformative nature of near-death experiences. Discover how these moments can bring a sense of bliss, clarity, and a deeper understanding of life. Join us as we delve into the stories and insights of those who have experienced the extraordinary.

Watch Now: Unveil the blissful journey of near-death experiences and their impact on our lives.

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Author: Digital Jockey

39 thoughts on “Near-Death Experience: A Blissful Journey

  1. जब कोई भी आत्मा अपने मूल स्थान जहाँ से अनंत समय पूर्व आयी है वहां वापिस नहीं पहुंची और यहीं चौरासी लाख योनियों में भटक रही थी तब उस परम पुरुष उस परम तत्व ने अपने को मथ कर कबीर साहिब जी को निकाला और धरती पर जाकर मनुष्य की आत्मा को चेतन करने के लिए कहा उस परम पुरुष ईश्वर को इस मनुष्य शरीर से अनुभव नहीं किया जा सकता है इसी लिए कबीर साहिब जी ने संत मत स्थापित किया जो संत समाधी लगाकर उस परम तत्व से मिल लेता है उस संत से ईश्वर का सच्चा नाम लेने पर चौरासी लाख योनिओ का जन्म मरण का चक्र नष्ट हो जाता है कबीर साहिब ने अपनी रचनाओं में कहा है न हम रहले मात गर्भ में न हमरे ग्रही और दासी नीरू के घर नाम धराया जग में होगई हांसी सात द्वीप नो खंड में गुरु से बड़ा न कोई करता करे न कर सके गुरु करे सो होय सन 1400 में अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप का किसी को पता ही नहीं था शून्य में रचो संसारा शून्य का है खेल सारा,और संतमत स्थापित किया गुरु नानक देव जी को अमरलोक ले गए 52 लाख लोगो को नाम दान दिया जिनमे मुख्य काशी का हिन्दू राजा वीर सिंह भगेल,17अवध के जिलों का नवाब बिजली खान पठान, उनका शिष्य था और सिकंदर लोधी दिल्ली का सुलतान और शेख ताकि को भी नामदान दिया जिसने 52 बार उनको मृत्यु दंड दिया क्योंकि कबीर साहिब पांच तत्वों से नहीं बने थे इसलिए उनको कुछ भी नहीं हुआ शेख तकि की मृत लड़की को जिन्दा किया उसका नाम कमाली हुआ गंगा में तैरते मुर्दे को जिन्दा किया उसका नाम कमाल हुआ काशी के प्रकांड पंडित सर्वदानंद को भी आत्मज्ञान दिया और आखिर में मगहर में गायब हो गए उनके शरीर की जगह फूल मिले मुसलमानो ने मजार बनाई हिन्दुओं ने समाधी बनाई कोई अपने गुरु के टुकड़े करके समाधी या मजार नहीं बनाएगा चौथे लोक का सन्देश दिया यह देश काल का देश है यहाँ कर्म का जाल पसारा है चल हंसा सतलोक (जहाँ से सभी आत्माये अनंत समय पूर्व आयी है) और बताया की ३ करोड़ वर्षों बाद लगभग १०० वर्षो के लिए मनुष्य का शरीर मिलता है इससे पहिले मृत्यु होने पर बाकी बची उम्र भोगने के लिए फिर मनुष्य देह मिलती है
    और बताया तेरा बैरी कोई नहीं तेरा बैरी मन, मन इंसान का दिमाग है यह सिर्फ इस शरीर और इस संसार के बारे में ही सोचेगा आत्मा के बारे में कभी सोचने ही नहीं देगा कबीर साहिब चाहते तो संत रविदास जी को स्वयं नामदान दे सकते थे लेकिन उनको रामानंद जी के द्वारा नामदान दिलवाया और रविदास जी ने भी समाधी लगाकर उस परमतत्व की प्राप्ति की कबीर साहिब चाहते थे की समाज में जातीय सदभावना हो कबीर साहिब जी ने रामानंद जी को भी आत्म ज्ञान दिया 32 संतो ने कबीर साहिब की संतमत की आइडियोलॉजी को फॉलो किया और भक्तिकाल की शुरुवात हुई

  2. धर्मदास जी को मिले कबीर परमात्मा

    आज मोहे दर्शन दियो जी कबीर।। टेक।।

    सत्यलोक से चल कर आए, काटन जम की जंजीर। ।1।।

    थारे दर्शन से म्हारे पाप कटत हैं, निर्मल होवे जी शरीर।।2।।

    अमृत भोजन म्हारे सतगुरु जीमें, शब्द दूध की खीर।।3।।

    हिन्दू के तुम देव कहाये, मुस्लमान के पीर। 14।।

    दोनों दीन का झगड़ा छिड़ गया, टोहे ना पाये शरीर। ।5।।

    धर्मदास की अर्ज गोसाई, बेड़ा लंचाईयो परले तीर। 16।।

    रहे नल नील जतन कर हार, तब सतगुरू से करी पुकार।

    जा सत रेखा लिखी अपार, सिन्धु पर शिला तिराने वाले।

    धन-धन सतगुरु सत कबीर, भक्त की पीर मिटाने वाले।

    कबीर सागर में अमर मूल बोध सागर पृष्ठ 265

    तब कबीर अस कहेवे लीन्हा, ज्ञानभेद सकल कह दीन्हा।।

    धर्मदास में कहो बिचारी, जिहिते निबह सब संसारी।।

    प्रथमहि शिष्य होय जो आई, ता कह पान देहु तुम भाई। ।1।।

    जब देखहु तुम द्रढ़ता ज्ञाना, ता कहें कहहू शब्द प्रवाना। 1211

    शब्द मांहि जब निश्चय आवै, ता कह ज्ञान अगाध सुनावै।।3।।

    तहाँ वहाँ लीन भए निरवानी, मगन रूप साहेब सैलानी।। (1)

    तहीं वहाँ रोवत है धर्मनी नागर, कहाँ गए मेरे सुख के सागर।। (2)

    हम जाने तुम देह स्वरूपा, हमरी बुद्धि अन्ध गहर कूपा।। (3)

    हम तो मानुष रूप तुम जाना, सुन सतगुरू कहीं किया पीयाना।। (4)

    कल्प करें और मन में रोवै, दर्शा दिशा को वह मग जीवे।। (5)

    बेगी मिलो करहूँ अपघाता, मैं ना जीऊँ सुनो विधाता ।। (6)

    तुम सतगुरु अविगत अधिकारी, में नहीं जानी लीला थारी। (7)

    तुम अविगत अविनाशी सांई, फिर मोकूं कहीं मिलो गोसाई। (8)

    ऐसा वियोग हुआ हम सेती, जैसी निर्धन की लुटजा खेती। (9)

    बेग मिलो कर हूँ अपघाता, मैं ना जीयूँ सुनो विधाता। (10)

    तुम सतगुरु अविगत अधिकारी, में नहीं जानी लीला थारी।

    तुम अविगत अविनाशी सांई, फिर मोकूं कहाँ मिलो गोसाई।

    ऐसा वियोग हुआ हम सेती, जैसी निर्धन की लुटजा खेती।

    बेग मिलो कर हूँ अपघाता, मैं ना जीयूँ सुनो विधाता।कौन तुम्हारी जाति कहां से आए स्वामी।

    पुर्छ पुरुष कबीर धनी साहिब निःकामी।।

    राम कष्ण कोट्यो गए धनी एक का एक।

    जिन्द कह धर्मदास से पूछो ज्ञान विवेक।।

    जठर अग्नि से राखे साख सुर्नी धर्मदासा।

    तजि पत्थर की पूजा छोड यह बोदी आशा।।

    जाका करो विचार सकल जिन सष्टी रवाई।

    वार-पार नहीं कोय बोलत सब घट मांही ।।

    हम उत्तरे त्व काज शुन्य से किया पियाना।

    शब्द रूप धरि देह समझ बानी सुर ज्ञाना।।

    बेद कलेब न जाको पार्वे, अठारह पुराण कथा नित गांयें।

    सनक सनन्दन ब्रह्म थाके, अनन्त कोटि शंकर पद भाखे ।।

    निर्णय किन्हें न किन्हा भाई, कोटि विष्णु गए दुनि रचाई।

    चतुर्भुजि नहीं अष्ट-अनादं, संहज भुजा कोए जाने साधम।

    शब्द-शब्द रहगा भाई, दुनी सष्टी सब प्रलय जाई।

    संख भूजा पर संख स्थूलं, जाका उर्धव विमानं झूलें।

    चलसी (नष्ट हो जाऐगें) स्वर्ग पाताल समूलं,

    चलसी चन्द्र सूर दो फूलं।

    जो आरम्भ चले धर्मदासा, पिण्ड प्राण चलसी घट श्वासा।

    इन्द्र कुबेर वरूण, धर्मराजा, ब्रह्मा, विष्णु, शिव चलै सब साजा।

    चले आदि माया ब्रह्म ज्ञानी, हम नहीं चलें जो पद प्रवानी।।

    अक्षर रूप रहे नहीं कोई, जिन एती लीला समोई।

    परम अक्षर है रूप हमारा, हम नहीं चलें चलै संसारा।

    कबीर, धर्मदास तोहे लाख दोहाई,

    सार शब्द कभी बाहर न जाई।।

    सार शब्द बाहर जो पड़ही। बिचली पीढ़ी हंस न तरही।

    फिर कहा है किरू धर्मदास तोहे लाख दुहाई।

    सार ज्ञान कभी बाहर ना जाई।

    सार ज्ञान बाहर जो परही। बिचली पीढ़ी हंस नहीं तिरही

  3. कबीर सागर कबीर वाणी पृष्ठ नं. 136-137 पर वाणी लिखी है किः- सम्वत् सत्रासै पचहत्तर होई, तादिन प्रेम प्रकटें जग सोई। साखी हमारी ले जीव समझावै, असंख्य जन्म ठौर नहीं पावै। बारवें पंथ प्रगट है बानी, शब्द हमारे की निर्णय ठानी। अस्थिर घर का मरम न पावैं, ये बारा पंथ हमही को ध्यावें। बारवें पंथ हम ही चलि आवैं, सब पंथ मेटि एक ही पंथ चलावें। धर्मदास मोरी लाख दोहाई, सार शब्द बाहर नहीं जाई। सार शब्द बाहर जो परही, बिचली पीढी हंस नहीं तरहीं। तेतिस अर्ब ज्ञान हम भाखा, सार शब्द गुप्त हम राखा। मूल ज्ञान तब तक छुपाई, जब लग द्वादश पंथ मिट जाई।

    द्वादश पंथ काल फुरमाना। भुले जीव न जाय ठिकाना।। (प्रथम) आगम कहि हम राखा। वंश हमार चूरामणि शाखा। दूसर जग में जागू भ्रमावै। बिना भेद ओ ग्रन्थ चुरावे।। तीसरा सुरति गोपालहि होई। अक्षर जो जोग दृढ़ावे सोई।।

    चौथा मूल निरंजन बानी। लोकवेद की निर्णय ठानी।। पंचम पंथ टकसार भेद लै आवै। नीर पवन को सन्धि बतावै।। सो ब्रह्म अभिमानी जानी। सो बहुत जीवनकीकरी है हानी।। छठवाँ पंथ बीज को लेखा। लोक प्रलोक कहें हममें देखा।।

    पांच तत्व का मर्म दृढ़ावै। सो बीजक शुक्ल ले आवै।। सातवाँ पंथ सत्यनामि प्रकाशा। घटके माहीं मार्ग निवासा।।

    आठवाँ जीव पंथले बोले बानी। भयो प्रतीत मर्म नहिं जानी।। नौमा राम कबीर कहावै। सतगुरू भ्रमलै जीव दृढ़ावै।।

    दशवां ज्ञानकी काल दिखावै। भई प्रतीत जीव सुख पावै।। ग्यारहवाँ भेद परमधाम की बानी। साख हमारी निर्णय ठानी।।

    साखी भाव प्रेम उपजावै। ब्रह्मज्ञान की राह चलावै।। तिनमें वंश अंश अधिकारा। तिनमेंसो शब्द होय निरधारा ।।

    संवत सत्रसै पचहत्तर होई। तादिन प्रेम प्रकटें जग सोई।। आज्ञा रहै ब्रह्म बोध लावे। कोली चमार सबके घर खावे।।

    साखि हमार लै जिव समुझावै। असंख्य जन्म में ठौर ना पावै।। बारवै पन्थ प्रगट होवै बानी। शब्द हमारे की निर्णय ठानी।।

    अस्थिर घर का मरम न पावैं। ये बारा पंथ हमहीको ध्यावें।। बारहें पन्थ हमही चलि आवै। सब पंथ मिठा एकहीपंथ चलावै।।

    प्रथम वंश उत्तम । ।। दूसरा वंश अहंकारी।2। तीसरा वंश प्रचंड । 3। चौथे वंश बीरहे। 4। पाँचवें वंश निद्रा ।5। छटे वंश उदास 16। सांतवें वंश ज्ञानचतुराई ।7। आठे द्वादश पन्थ विरोध ।8। नौवं वंश पंथ पूजा 19। दसवें वंश प्रकाश।10। ग्यारहवें वंश प्रकट

    पसारा ।11। बारहवें वंश प्रगट होय उजियारा।12। तेरहवें वंश मिटे सकल अँधियारा।13।

    इसमें परमेश्वर कबीर जी ने आदरणीय धर्मदास जी को वंश प्रकार बताते हुए कहा है कि में स्वयं 12वें कबीर पंथ यानि

    गरीबदास पंथ में आऊँगा और सभी पंथों को समाप्त कर एक यथार्थ कबीर पंथ यानि 13वां पंथ चलाऊंगा। साथ ही कबीर साहेब जी ने बताया है कि 12वें पंथ यानि गरीबदास पंथ से थोड़ा-थोड़ा ज्ञान का उजियारा होगा जबकि मेरे 13वें पंथ से अध्यात्म में फैले अज्ञान का अधियारा मिटेगा। वर्तमान समय में कबीर परमेश्वर ही जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज के रूप में अवतरित हुए हैं जिनका बारहवें पंथ से निकास हुआ है और वे तेरहवां यथार्थ कबीर पंथ चला रहे हैं।

  4. संत गरीबदास जी को मिले कबीर परमात्मा

    अजब नगर में ले गया, हमकूं सतगुरु आन। झिलके बिम्ब अगाध गति, सूते चादर तान।।

    अनन्त कोटि ब्रह्मण्ड का एक रति नहीं भार। सतगुरु पुरुष कबीर हैं कुल के सृजन हार।।

    गैबी ख्याल विशाल सतगुरु, अचल दिगम्बर थीर है। भक्ति हेत काया धर आये, अविगत सत् कबीर हैं।।

    हरदम खोज हनोज हाजर, त्रिवैणी के तीर हैं। दास गरीब तबीब सतगुरु, बन्दी छोड़ कबीर हैं।।

    हम सुल्तानी नानक तारे, दादू कूं उपदेश दिया। जात जुलाहा भेद नहीं पाया, काशी माहे कबीर हुआ।।

    सब पदवी के मूल हैं, सकल सिद्धि हैं तीर। दास गरीब सतपुरुष भजो, अविगत कला कबीर।।

    जिंदा जोगी जगत् गुरु, मालिक मुरशद पीर। दहूँ दीन झगड़ा मंड्या, पाया नहीं शरीर।।

    गरीब जिस कूं कहते कबीर जुलाहाा। सब गति पूर्ण अगम अगाहा।।

    बिन ही मुख सारंग राग सुन, बिन ही तंती तार। बिना सुर अलगोजे बजैं, नगर नांच घुमार।।

    घण्टा बाजै ताल नग, मंजीरे डफ झांझ। मूरली मधुर सुहावनी, निसबासर और सांझ ।।

    बीन बिहंगम बाजहिं, तरक तम्बूरे तीर। राग खण्ड नहीं होत है, बंध्या रहत समीर।।

    तरक नहीं तोरा नहीं, नांही कशीस कबाब। अमृत प्याले मध पीवैं, ज्यों भाटी चवैं शराब ।।

    मतवाले मस्तानपुर, गली-2 गुलजार। संख शराबी फिरत हैं, चलो तास बजार ।।

    संख-संख पत्नी नाचौं, गावैं शब्द सुभान। चंद्र बदन सूरजमुखी, नांही मान गुमान।।

    संख हिंडोले नूर नग, झूलें संत हजूर। तख्त धनी के पास कर, ऐसा मुलक जहूर।।

    नदी नाव नाले बगैं, छूटें फुहारे सुत्र। भरे होद सरवर सदा, नहीं पाप नहीं पुण्य।।

    ना कोई भिक्षुक दान दे, ना कोई हार व्यवहार। ना कोई जन्मे मरे, ऐसा देश हमार।।

    जहां संखों लहर मेहर की उपजैं, कहर जहां नहीं कोई। दासगरीब अचल अविनाशी, सुख का सागर सोई।।

    सब पदवी के मूल हैं, सकल सिद्ध हैं तीर। दास गरीब सतपुरुष भजो, अविगत कला कबीर।।

    अलल पंख अनुराग है, सुन्न मण्डल रहे थीर। दास गरीब उधारिया, सतगुरु मिलें कबीर।।

    पूजें देई धाम को, शीश हलावें जो। गरीबदास साची कहैं, हद काफिर हैं सो।

  5. संत दादूदास जी को मिले कबीर परमात्मा

    आदरणीय दादू साहेब जी जब सात वर्ष के बालक थे तब पूर्ण परमात्मा जिंदा महात्मा के रूप में मिले तथा सत्यलोक ले गए। तीन दिन तक दादू जी बेहोश रहे। होश में आने के पश्चात् परमेश्वर की महिमा की आँखों देखी बहुत-सी अमृतवाणी

    उच्चारण की :

    जिन मोकुं निज नाम दिया, सोइ सतगुरु हमार। दादू दूसरा कोई नहीं, कबीर सृजन हार ।। दादू नाम कबीर की, जै कोई लेवे ओट। उनको कबहू लागे नहीं, काल बज्र की चोट ।। दादू नाम कबीर का, सुनकर कांपे काल। नाम भरोसे जो नर चले, होवे न बंका बाल ।। जो जो शरण कबीर के, तरगए अनन्त अपार। दादू गुण कीता कहे, कहत न आवै पार।। कबीर कर्ता आप है, दूजा नाहिं कोय। दादू पूरन जगत को, भक्ति दृढावत सोय ।। ठेका पूरन होय जब, सब कोई तजै शरीर। दादू काल गॅजे नहीं, जपै जो नाम कबीर ।। आदमी की आयु घटै, तब यम घेरे आय। सुमिरन किया कबीर का, दादू लिया बचाय ।। मेटि दिया अपराध सब, आय मिले छनमाँह। दादू संग ले चले, कबीर चरण की छांह।। सेवक देव निज चरण का, दादू अपना जान। भृंगी सत्य कबीर ने, कीन्हा आप समान ।। दादू अन्तरगत सदा, छिन छिन सुमिरन ध्यान। वारु नाम कबीर पर, पल-पल मेरा प्रान।। सुन-2 साखी कबीर की, काल नवावै माथ। धन्य-धन्य हो तिन लोक में, दादू जोड़े हाथ ।। केहरि नाम कबीर का, विषम काल गज राज। दादू भजन प्रतापते, भागे सुनत आवाज ।। पल एक नाम कबीर का, दादू मनचित लाय। हस्ती के अश्वार को, श्वान काल नहीं खाय ।। सुमरत नाम कबीर का, कटे काल की पीर। दादू दिन दिन ऊँचे, परमानन्द सुख सीर ।। दादू नाम कबीर की. जो कोई लेवे ओट। तिनको कबहुं ना लगई, काल बज्ज की चोट ।। और संत सब कूप हैं, केते झरिता नीर। दादू अगम अपार है, दरिया सत्य कबीर ।। अबही तेरी सब मिटै, जन्म मरन की पीर। स्वांस उस्वांस सुमिरले, दादू नाम कबीर ।। कोई सर्गुन में रीझ रहा, कोई निर्गुण ठहराय। दादू गति कबीर की, मोते कही न जाय ।। जिन मोकुं निज नाम दिया, सोइ सतगुरु हमार। दादू दूसरा कोई नहीं, कबीर सृजन हार ।।

  6. मलूक दास जी को मिले कबीर परमात्मा

    आदरणीय मलूक दास साहेब जी कविर्देव के साक्षी -42 वर्ष की आयु में श्री मलूक दास साहेब जी को पूर्ण परमात्मा मिले तथा दो दिन तक श्री मलूक दास जी अचेत रहे।

    फिर निम्न वाणी उच्चारण की।

    जपो रे मन सतगुरु नाम कबीर।। टेक ।।

    जपो रे मन परमेश्वर नाम कबीर।

    एक समय गुरु बंसी बजाई कालंद्री के तीर।

    सुर-नर मुनि थक गए, रूक गया दरिया नीर।।

    काँशी तज गुरु मगहर आये, दोनों दीन के पीर।

    कोई गाढ़े कोई अग्नि जरावै, ढूंडा न पाया शरीर।

    चार दाग से सतगुरु न्यारा, अजरो अमर शरीर।

    दास मलूक सलूक कहत हैं, खोजो खसम कबीर।।

  7. गुरु नानकदेव जी को मिले कबीर परमात्मा

    "हक्का कबीर करीम तू, बेएब परवरदीगार। नानक बुगोयद जनु तुरा, तेरे चाकरां पाखाक" एक सुआन दुई सुआनी नाल, भलके भौंकही सदा बिआल

    कुड़ छुरा मुठा मुरदार, धाणक रूप रहा करतार।।1।। मै पति की पंदि न करनी की कार। उह बिगड़ै रूप रहा बिकराल ।।

    तेरा एक नाम तारे संसार, मैं ऐहो आस एहो आधार।

    मुख निंदा आखा दिन रात, पर घर जोही नीच मनाति ।। काम क्रोध तन वसह चंडाल, धाणक रूप रहा करतार।।2।। फाही सुरत मलूकी वेस, उह ठगवाड़ा ठगी देस।। खरा सिआणां बहुता भार, धाणक रूप रहा करतार। ।3।। मैं कीता न जाता हरामखोर, उह किआ मुह देसा दुष्ट चोर। नानक नीच कह बिचार, धाणक रूप रहा करतार।।4।। (कबीर जी) उह गुरु जी चरनि लागि करवै, बीनती को पुन करीअहु देवा। अगम अपार अझै पद कहिए, सो पाईए कित सेवा ।। कहै कबीर सुनहु गुरु नानक, मैं दीजै शब्द बीचारं । ।1। (नानक जी) नानक कह सुनों कबीर जी, सिखिया एक हमारी।

    मुहि समझाई कहहु गुरु पूरे, भिन्न-भिन्न अर्थ दिखावहु ।

    जिह बिधि परम अझै पद पाईये, सा विधि मोहि बतावहु।

    मन बच करम कृपा करि दीजै, दीजै शब्द उचारं ।।

    तन मन जीव ठौर कह ऐकै, सुंन लागवहु तारी।। करम अकरम दोऊँ तियागह, सहज कला विधि खेलहु ।

  8. गरीब, सतगुरु के लक्षण कहूँ, मधुरे बैन बिनोद। चार बेद षट् शास्त्र, कह अठारह बोध ।।

    गुरु के लक्षण चार बखाना, प्रथम वेद शास्त्र को ज्ञाना।।

    दुजे हरि भक्ति मन कर्म बानि, तीजे समदृष्टि करि जानी।। चौथे वेद विधि सब कर्मा, ये चार गुरू गुण जानों मर्मा ।।

    सरलार्थ :- कबीर परमेश्वर जी ने कहा है कि जो सच्चा गुरू होगा, उसके चार मुख्य लक्षण होते हैं:-

    1. सब वेद तथा शास्त्रों को वह ठीक से जानता है।

    • दूसरे वह स्वयं भी भक्ति मन-कर्म-वचन से करता है अर्थात् उसकी कथनी और करनी में कोई अन्तर नहीं होता।

    तीसरा लक्षण यह है कि वह सर्व अनुयाईयों से समान व्यवहार करता है, भेदभाव नहीं रखता।

    ● चौथा लक्षण यह है कि वह सर्व भक्ति कर्म वेदों (चार वेद तो सर्व जानते हैं

    1. ऋग्वेद, 2. यजुर्वेद, 3. सामवेद, 4. अथर्ववेद तथा पाँचवां वेद सूक्ष्मवेद है, इन सर्व वेदों) के

    अनुसार करता और कराता है।

    पूर्ण सतगुरु संत रामपाल जी महाराज

  9. गरीब, सतगुरु के लक्षण कहूँ, मधुरे बैन बिनोद। चार बेद षट् शास्त्र, कह अठारह बोध ।।

    गुरु के लक्षण चार बखाना, प्रथम वेद शास्त्र को ज्ञाना।।

    दुजे हरि भक्ति मन कर्म बानि, तीजे समदृष्टि करि जानी।। चौथे वेद विधि सब कर्मा, ये चार गुरू गुण जानों मर्मा ।।

    सरलार्थ :- कबीर परमेश्वर जी ने कहा है कि जो सच्चा गुरू होगा, उसके चार मुख्य लक्षण होते हैं:-

    1. सब वेद तथा शास्त्रों को वह ठीक से जानता है।

    • दूसरे वह स्वयं भी भक्ति मन-कर्म-वचन से करता है अर्थात् उसकी कथनी और करनी में कोई अन्तर नहीं होता।

    तीसरा लक्षण यह है कि वह सर्व अनुयाईयों से समान व्यवहार करता है, भेदभाव नहीं रखता।

    ● चौथा लक्षण यह है कि वह सर्व भक्ति कर्म वेदों (चार वेद तो सर्व जानते हैं

    1. ऋग्वेद, 2. यजुर्वेद, 3. सामवेद, 4. अथर्ववेद तथा पाँचवां वेद सूक्ष्मवेद है, इन सर्व वेदों) के

    अनुसार करता और कराता है।

    पूर्ण सतगुरु संत रामपाल जी महाराज

  10. संत रामपालजी महाराजही पुरन गुरु और पुरन परमातमा हैं
    और सब पाखंडी बाबा बकवास करते रहते हैं

  11. १३ साल पहले हमने नियर डेथ एक्सपीरियंस का अनुभव किया है । खुद का अनुभव है जो बहुत अदभुत nd सुखद था । भगवान की कृपा है जिन्होने ब्रह्मांड के रहस्य से वाकेफ करवाया 🙏✨

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